आधुनिक हिन्दी साहित्य में राष्ट्रवाद की अवधारणा: एक समीक्षात्मक अध्ययन
Keywords:
आधुनिक हिन्दी साहित्य, राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता, सामाजिक न्याय, प्रगतिवाद, समकालीन विमर्शAbstract
आधुनिक हिन्दी साहित्य में राष्ट्रवाद की अवधारणा एक सजीव, बहुआयामी और ऐतिहासिक चेतना के रूप में विकसित हुई है। यह अवधारणा केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की आकांक्षा तक सीमित नहीं रही, बल्कि सांस्कृतिक आत्मबोध, सामाजिक सुधार, मानवीय मूल्यों और लोकतांत्रिक चेतना से भी गहराई से जुड़ी रही है। औपनिवेशिक शासन के दौरान हिन्दी साहित्य ने राष्ट्रवादी चेतना को जाग्रत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारतेन्दु युग में राष्ट्रवाद का स्वर प्रत्यक्ष, आह्वानात्मक और जन-जागरणकारी रहा, जबकि द्विवेदी युग में यह नैतिक, सुधारवादी और अनुशासित रूप में सामने आया। छायावाद ने राष्ट्रवादी चेतना को भावनात्मक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गौरव से जोड़ा। प्रगतिवादी साहित्य में राष्ट्रवाद का पुनर्पाठ सामाजिक न्याय, वर्ग-संघर्ष और जनसाधारण की मुक्ति के संदर्भ में किया गया।
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