वैदिक साहित्य में ‘ऋत’ की अवधारणा: दार्शनिक एवं सामाजिक समीक्षा
Keywords:
ऋत, वैदिक साहित्य, धर्म, सत्य, कर्म, सामाजिक व्यवस्थाAbstract
वैदिक साहित्य भारतीय दर्शन, संस्कृति और सामाजिक चेतना की आधारभूमि है। इस साहित्य में ‘ऋत’ की अवधारणा ब्रह्मांडीय व्यवस्था, नैतिकता, सत्य और सामाजिक अनुशासन का मूल सिद्धांत मानी जाती है। ऋत केवल प्राकृतिक नियमों का द्योतक नहीं है, बल्कि यह देवताओं, मनुष्य और समाज के मध्य संतुलन स्थापित करने वाला सार्वभौमिक सिद्धांत है। प्रस्तुत समीक्षा लेख में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद के संदर्भ में ‘ऋत’ की अवधारणा का गहन विश्लेषण किया गया है। साथ ही इसके दार्शनिक आधार, सामाजिक प्रभाव, तथा उत्तरवैदिक काल में धर्म एवं कर्म सिद्धांत के रूप में हुए रूपांतरण की आलोचनात्मक विवेचना की गई है। यह अध्ययन यह प्रतिपादित करता है कि ऋत भारतीय दार्शनिक चिंतन की केन्द्रीय धुरी है, जिसकी प्रासंगिकता समकालीन पर्यावरणीय, नैतिक एवं सामाजिक संकटों के समाधान में आज भी बनी हुई है।
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