इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता में पर्यावरण विमर्श (1990-2020)

Authors

  • शेख सिराज बशा Author

Keywords:

पर्यावरण विमर्श, हिंदी कविता, समकालीन कविता, पारिस्थितिक चेतना, 1990-2020.

Abstract

इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता में पर्यावरण विमर्श ने एक नया रूप धारण किया है, जहां कवि प्रकृति के विनाश को मानवीय लालच और उपेक्षा का परिणाम मानते हैं। कुमार अम्बुज की कविताओं में विषैली हवा और सूखी नदियों का चित्रण मिलता है, जैसे "विषैली हो रही है पर्यावरण रात-दिन"। केदारनाथ सिंह ने नदी-वन संकट को शोकगीत के रूप में उकेरा, जबकि अनामिका और गिरिराजशरण अग्रवाल जैसे कवियों ने वृक्षारोपण व संरक्षण का आह्वान किया। यह शोध पत्र 1990-2020 की 20 प्रमुख कविताओं का गुणात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। प्रमुख थीम्स में जल संकट (35%), वन विनाश (25%), वायु प्रदूषण (20%) और पारिस्थितिक संतुलन (20%) शामिल हैं। पारिस्थितिक आलोचना सिद्धांत के आधार पर विश्लेषण दर्शाता है कि हिंदी कविता न केवल समस्या चित्रण करती है, बल्कि सामाजिक जागृति का माध्यम भी बनी। 1990-2000 में चेतावनी प्रधान विमर्श था, जबकि 2010-2020 में समाधानात्मक दृष्टिकोण उभरा।

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Published

2026-01-24

How to Cite

इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता में पर्यावरण विमर्श (1990-2020). (2026). अमृत काल (Amrit Kaal), ISSN: 3048-5118, 4(1), 23-26. https://languagejournals.com/index.php/amritkaal_Journal/article/view/119

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