स्वतंत्रता के बाद हिन्दी कविता में सामाजिक चेतना
Keywords:
हिन्दी कविता, सामाजिक चेतना, स्वतंत्रता के बाद, प्रगतिवाद, नई कविता, दलित विमर्श, स्त्री विमर्शAbstract
स्वतंत्रता के बाद हिन्दी कविता केवल सौंदर्यबोध या आत्मानुभूति तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह भारतीय समाज के बदलते यथार्थ की सशक्त अभिव्यक्ति बन गई। औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के बाद देश के सामने सामाजिक पुनर्निर्माण, लोकतंत्र की स्थापना, वर्ग-संघर्ष, जातिगत विषमता, आर्थिक असमानता, स्त्री-विमर्श, दलित चेतना, आदिवासी प्रश्न, शहरीकरण, औद्योगीकरण तथा वैश्वीकरण जैसी अनेक चुनौतियाँ उपस्थित हुईं। इन समस्त सामाजिक परिवर्तनों और अंतर्विरोधों को हिन्दी कविता ने अपनी संवेदना का केंद्र बनाया। प्रस्तुत समीक्षा लेख में स्वतंत्रता के बाद की हिन्दी कविता में निहित सामाजिक चेतना का क्रमिक, वैचारिक एवं कलात्मक विश्लेषण किया गया है। इसमें प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, साठोत्तरी कविता, दलित कविता, स्त्रीवादी कविता तथा समकालीन कविता के माध्यम से सामाजिक चेतना के विविध रूपों का अध्ययन किया गया है।
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