दलित विमर्श और हिन्दी साहित्य: एक आलोचनात्मक समीक्षा
Keywords:
दलित विमर्श, हिन्दी साहित्य, सामाजिक न्याय, अम्बेडकरवाद, अस्मिता, प्रतिरोध, जाति-व्यवस्थाAbstract
भारतीय समाज की संरचना ऐतिहासिक रूप से वर्ण–व्यवस्था, जातिगत असमानता और सामाजिक विभाजन पर आधारित रही है। इस संरचना में दलित वर्ग सदियों से सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और सांस्कृतिक उत्पीड़न का शिकार रहा है। दलित विमर्श इसी उत्पीड़न के विरुद्ध चेतना, प्रतिरोध और आत्मसम्मान की वैचारिक प्रक्रिया है। हिन्दी साहित्य में दलित विमर्श का उदय केवल साहित्यिक घटना नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की सशक्त अभिव्यक्ति है। प्रस्तुत समीक्षा-लेख का उद्देश्य दलित विमर्श की अवधारणा, उसके सैद्धान्तिक आधार, सामाजिक पृष्ठभूमि तथा हिन्दी साहित्य में उसके विकास की आलोचनात्मक विवेचना करना है। यह लेख यह स्पष्ट करता है कि दलित विमर्श केवल जाति-आधारित पीड़ा का आख्यान नहीं, बल्कि मानव-मूल्यों, समानता, स्वतंत्रता और न्याय की स्थापना का साहित्यिक संघर्ष है।
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